Sunday, May 31, 2009

आप की याद केसे आएँगी,
आप क्यों ये समाज न पाते हे ,
याद तो सीर्फ उनकी आती हे ,
जीनको हम कभी भूल जाते हे ..
अशकों में जेसे धुल गए सब मुसुकुराते रंग ,
रासते में थक के सो गयी मासूम सी उमंग,
दिल हे की फीर भी ख्वाब सजाने का शोख हे ,
पत्थर पे भी गुलाब उगने का शोख हे ,
बरसो से यूं तो एक अमावस की रात हे ,
अब इसको होसला कहू ये जीद की बात हे ,
दील कहेता हे अँधेरे में भी रौशनी तो हे ,
माना की राख हो गयी उम्मीद के अलावा,
इस राख में भी आग कही पर तपी तो हे ....